नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में तमिलनाडु में सरकार बदलने के बाद कुछ राजनेताओं पर मुकदमा चलाने की मंजूरी वापस लेने के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट इस प्रथा को एक ऐसी बीमारी बताया जो ‘पूरे देश में फैल गई है’। कोर्ट राजनेताओं और महत्वपूर्ण सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मामलों का उल्लेख कर रहा था, जो या तो जादुई रूप से ध्वस्त हो जाते हैं या नई सरकार उन्हें बचाने के लिए मुकदमा चलाने की मंजूरी वापस लेने की कोशिश करती है।
मंजूरी वापस लेना कानूनी रूप से संभव?
हालांकि पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) दोनों ही निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी चरण में मामलों को वापस लेने की अनुमति देते हैं। फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो अभियोजन की मंजूरी वापस लेने की अनुमति देता हो, जो आमतौर पर सरकारी अधिकारियों या मंत्रियों के शामिल होने पर आवश्यक होता है। तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यही मुद्दा है: क्या मंजूरी वापस लेना कानूनी रूप से संभव है?
याचिकाकर्ता, चेन्नई स्थित वकील करुप्पैया गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से मौजूदा राज्य मंत्रियों के खिलाफ मुकदमे तमिलनाडु से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की है ताकि राज्य सरकार उनके साथ छेड़छाड़ न कर सके। उनकी याचिका में 18 डीएमके नेताओं के नाम हैं। इनमें वरिष्ठ मंत्री दयानिधि मारन (एक दशक पुराने निजी टेलीफोन एक्सचेंज मामले में), के. पोनमुडी (आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति), थंगम थेन्नारासु, केकेएसएसआर रामचंद्रन, आई पेरियासामी, के एस मस्थान, के एन नेहरू, सेंथिल बालाजी और अन्य शामिल हैं। इनमें से अधिकतर मामले भ्रष्टाचार या आय से अधिक संपत्ति से संबंधित हैं, जो अन्नाद्रमुक के सत्ता में रहने के दौरान दर्ज किए गए थे।
ब्युरो रिपोर्ट










